- पिता - मोकल
- माता - सौभाग्यवती परमार
- संरक्षक - रणमल
- रणमल की सहायता से अपने पिता की मौत का बदला लिया ।
- मेवाड़ में रणमल का प्रभाव बढ़ गया तथा सिसोदिया के नेता राघवदेव ( चुंडा का भाई ) को मरवा दिया
- हंसाबाई ने चूंडा को मालवा से वापस बुला लिया
- भरमाली की सहायता से रणमल को मार दिया
- रणमल का बेटा जोधा भाग गया और बीकानेर के पास का काहूनी नामक गांव मे शरण ली
- चुंडा ने राठौड़ों की राजधानी मंडोर ( जोधपुर ) पर अधिकार कर लिया ।
आवंल - बांवल की संधि ( 1453 ई.)
जोधा + कुम्भा
- सोजत ( पाली ) को मेवाड़ व मारवाड़ की सीमा बनाया गया
- जोधा को मंडोर वापस दे दिया गया
- कुंभा के बेटे रायमल और जोधा की पुत्री श्रृंगार कंवर की शादी कर दी गई।
सारंगपुर का युद्ध ( 1437 ई.)
कारण :-
- महमूद खिलजी ने मोकल के हत्यारों ( चाचा, मेरा व महपा पवार ) को शरण दी
- कुंभा ने महमूद खिलजी के विरोधी उमर खान को सैन्य सहायता देकर सारंगपुर पर अधिकार करवा दिया
- कुंभा तथा महमूद खिलजी की विस्तार वादी महत्वकांक्षाए ।
- कुम्भा जीत गया और उसने महमूद खिलजी को गिरफ्तार कर लिया था इस जीत की याद में चित्तौड़ में विजय स्तंभ बनाया गया ।
चंपानेर की संधि (1456 ई)
उद्देश्य :-
- राणा सांगा को हराकर चित्तौड़ के दक्षिण भाग पर गुजरात तथा खासभाग तथा अहीरवाड़ा पर मालवा का अधिकार करना
- महमूद खिलजी का प्रतिनिधि ताज खान कुतुबद्दीन शाह से मिला था
बदनोर (भीलवाड़ा ) का युद्ध (1457 ई.)
- कुम्भा ने मालवा तथा गुजरात की संयुक्त सेना को हराया कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति और रसिक प्रिया से यह जानकारी मिलती है
- कुंभा ने सिरोही के सहसमल देवड़ा को हराया । सहसमल देवड़ा ने गुजरात के कुतुबुद्दीन शाह की सहायता की थी इस समय कुंभा ने नरसिंह डोडीया के नेतृत्व में सेना भेजी थी
नागौर का उत्तराधिकार संघर्ष
फिरोज खान की मृत्यु के बाद उसके बेटे शम्स खान तथा छोटे भाई मुजाहिद खान में उत्तराधिकार का संघर्ष हो गया था जिसमें कुंभा शम्स खान की सहायता करता है और मुजाहिद खान को हरा देता है कालांतर में शम्स खान ने नागौर में किलेबंदी आरंभ कर दी अतः कुंभा ने नागौर पर हमला किया व शम्स खान भागकर गुजरात के कुतुबुद्दीन शाह के पास चला गया और अपनी पुत्री की शादी उससे करवा दी कुतुबुद्दीन शाह व शम्स खान ने मिलकर चित्तौड़ पर आक्रमण किया लेकिन कुंभा ने इन्हें हरा दिया इसी प्रकार नागौर का उत्तराधिकार संघर्ष मेवाड़ और गुजरात के बीच विवाद का कारण बना ।
कुम्भा की सांस्कृतिक उपलब्धियां
A.स्थापत्य कला
कुंभा को स्थापत्य कला का जनक कहा जाता है ।
- यह 9 मंजिला इमारत है ।
- इसकी ऊंचाई 122 फीट चौड़ाई 30 फीट है ।
- इसके आठवीं मंजिल पर कोई मूर्ति नहीं है ।
- तीसरी मंजिल पर 9 बार अरबी भाषा में अल्लाह शब्द लिखा है ।
- पांचवी मंजिल पर वास्तुकार - जैता, पूंजा, पोमा, नापा के नाम दिए है ।
- कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति के लेखक - अत्रि एवं महेश ।
- मेवाड़ महाराणा स्वरूप सिंह ने इसका पुनर्निर्माण करवाया ।
- जेम्स टॉड ने इसकी तुलना कुतुब मीनार से की ।
- फर्ग्युसन ने इसकी तुलना रोम के टार्जन टावर से की ।
- विजय स्तंभ राजस्थान की पहली इमारत है जिस पर डाक टिकट जारी किया गया ।
- राजस्थान पुलिस
- राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड
- अभिनव भारत ( वीर सावरकर का संगठन )
जैन कीर्ति स्तंभ
चित्तौड़ के किले में 7 मंजिला इमारत 12वी शताब्दी में जैन व्यापारी जीजा शाह बघेलवाल ने इसका निर्माण करवाया था यह भगवान आदिनाथ ( ऋषभदेव ) को समर्पित है इसलिए इसे आदिस्तंभ भी कहा जाता है ।
2. किले
कविराज समनदास जी की पुस्तक वीर विनोद के अनुसार कुंभा ने मेवाड़ के 84 में से 32 किलो का निर्माण करवाया था ।
a.कुंभलगढ़
- यह किला राजस्थान के राजसमंद में स्थित है ।
- वास्तुकार - मांडन
- कुंभलगढ़ मेवाड़ की संकटकालीन राजधानी थी
- इससे मेवाड़ मारवाड़ का सीमा प्रहरी भी कहा जाता है
- इसका ऊपरी स्थान का कटारगढ़ है जो कुंभा का निजी आवास था
- इसे मेवाड़ की आंख कहा जाता है
- कुंभलगढ़ प्रशस्ति के लेखक महेश ।
- यह प्रशस्ति मामा देव मंदिर के पास लगी है इस प्रशस्ति में कुंभा को धर्म व पवित्रता का अवतार तथा कर्ण व भोज के समान दानवीर बताया है ।
b.अचलगढ़ ( सिरोही )
- 1452 इसमें कुंभा ने इसका पुनर्निर्माण करवाया था ।
c.बसंतगढ़ ( सिरोही )
d.मचान दुर्ग ( सिरोही )
- मेरो पर नियंत्रण हेतु
भोमट दुर्ग ( उदयपुर )
- भीलों पर नियंत्रण हेतु
बैराठ ( भीलवाड़ा )
3.मंदिर
- चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़ तथा अचलगढ़ में विष्णु भगवान के कुंभ स्वामी मंदिरों का निर्माण करवाया
- एकलिंग जी में विष्णु मंदिर ( मीरामंदिर ) का निर्माण करवाया
- श्रृंगार चवरी मंदिर ( शांतिनाथ जैन मंदिर ) इसका निर्माण वेला भंडारी ( कोषाध्यक्ष - चित्तौड़ ) ने करवाया
रणकपुर ( पाली ) जैन मंदिर
- 1439 ई. में व्यापारी धारणकशाह ने इन मंदिरों का निर्माण करवाया ।
- मुख्य मंदिर ( चौमुखा मंदिर ) : इस मंदिर में भगवान आदिनाथ की मूर्ति है इस मंदिर में 1444 कमरे हैं इसलिए इसे खंभों का अजायबघर भी कहा जाता है ।
B.साहित्य
- कुंभा एक अच्छा संगीतज्ञ था ।
- वह वीणा बजाता था यह कीर्ति स्तंभ से प्राप्त होता है ।
- संगीत गुरु - सारंग व्यास ।
पुस्तके
- सुधा प्रबंध
- कामराज रति सार ( 7 भाग )
- संगीत सुधा
- संगीत मीमांसा
- संगीत क्रम दीपिका
- संगीत राज (5 भाग)स्तंभ
- पाठ्य रत्न कोष
- गीत रत्न कोष
- नृत्य रत्न कोष
- वाद्य रत्न कोष
- रस रत्न कोष
कुम्भा की टिकाएं
- जय देव की गीत गोविंद पर रसिकप्रिया लिखी ।
- सारंगधर की संगीत रत्नाकर पर टीका लिखी ।
- बाणभट्ट की चंडी शतक पर टिक्का लिखी ।
- कुंभा ने 4 नाटक लिखे ।
- मुरारी संगती - कन्नड़ में
- रसनंदिनी - मेवाड़ी में
- नंदिनी वर्ती - मराठी में
- अतुल चातुरी - संस्कृत में
कुंभा मराठी कन्नड़ मेवाड़ी भाषाओं का विद्वान था ।
दरबारी विद्वान
कान्ह व्यास
एकलिंग महात्मय ( पुस्तक )
- इस पुस्तक के अनुसार कुंभा वेद, स्मृति, मीमांसा, उपनिषद, व्याकरण व राजनीति में रुचि रखता था । इसका पहला भाग राज वर्णन कहलाता है जो कुंभा ने लिखा था ।
मेंहा जी
तीर्थ माला ( पुस्तक )
- इस पुस्तक में 120 तीर्थों का वर्णन किया गया है कवि मेहा जी कुंभलगढ़ व रणकपुर जैन मंदिरों के निर्माण की जानकारी देते हैं तथा रणकपुर के मंदिरों के प्रतिष्ठा समारोह में स्वयं उपस्थित थे मेहा जी के अनुसार कुंभा हनुमान जी की जो मूर्तियां सोजत व नागौर से लाया था उन्हें कुंभलगढ़ व रणकपुर में स्थापित किया गया था ।
मण्डन
- वास्तुसार
- देवमूर्ति प्रकरण ( रूपावतार )
- राजवल्लभ ( भूपति वल्लभ )
- रुप मंडल ( मूर्तिकला की जानकारी )
- कोदंड मंडल ( धनुष निर्माण की जानकारी )
नाथा
पुस्तक - वस्तु मंजरी
गोविंद : यह मण्डन का पुत्र था
- द्वार दीपिका
- उद्धार धोरिणी
- कलानिधि ( मंदिर शिखर निर्माण की जानकारी )
- सार समुच्चय ( आयुर्वेद की जानकारी )
रमा बाई : यह कुम्भा की बेटी थी
- अपने पिता की तरह यह भी संगीत में रुचि रखते थी ।
- रमाबाई को जावर परगना ( क्षेत्र ) दिया गया था ।
- उपाधि - वागीश्वरी ।
कुंभा की उपाधियां
- हिंदू सुरताण ( हिंदुओं का रक्षक )
- अभिनव भरताचार्य ( संगीत )
- राणा रासो ( साहित्य )
- हालगुरु ( पहाड़ी किले जीतने वाला )
- चापगुरु ( धनुर्धर )
- परम भागवत ( विष्णु भगत )
- आदि वराह ( विष्णु भगत )
मृत्यु
- कुंभा की हत्या उसके बेटे उदा ने कुंभलगढ़ में की थी
कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति
- 3 दिसंबर 1460 ई. ( मार्गशीर्ष कृष्ण पंचमी विक्रमी संवत 1517 )
- प्रशस्तिकार : अत्री भट्ट व महेश भट्ट
- यह प्रशस्ति अनुमानित 8 शिलाओ पर है वर्तमान में हमें दो ही प्राप्त हुई हैं ।
- इस प्रशस्ति में बप्पा रावल से लेकर कुंभा तक मेवाड़ के गुहिल वंश के शासकों की उपलब्धियां है ।
- इस प्रशस्ति में से कुंभा के विजय अभियानों की जानकारी मिलती है उदाहरण के लिए मंडोर, मराणा, बसंतपुर, आबू, खंडेला, जांगल देश, नागौर, गुजरात, मालवा इत्यादि ।
- इसमें मालवा व गुजरात की संयुक्त सेनाओं को परास्त करने का वर्णन भी मिलता है ।
- इस प्रशस्ति में कुंभा द्वारा रचित ग्रंथों की जानकारी भी मिलती है उदाहरण के लिए संगीत राज, चंडी शतक, तथा गीत गोविंद की टीका, सुधा प्रबंध, चार नाटक ।
- इस प्रशस्ति से कुंभलगढ़ , कीर्ति स्तंभ व अचलगढ़ में किए गए कार्यों का वर्णन मिलता है तथा तिथि मिलती है ।
कुंभा ने कीर्ति स्तंभ के विषय पर एक ग्रंथ ( स्तंभ राज ) की रचना की थी और कीर्ति स्तंभ की शिलाओं पर खुदवा कर स्थापित करवाया जिसके अनुसार उसने जय और पराजय ब्रह्मा जी के पुत्र के मतों को देकर इस ग्रंथ की रचना की है ।
