मारवाड़ का इतिहास

मारवाड़ का इतिहास

 मारवाड़ का इतिहास

  •  मारवाड़ में राठौड़ वंश का शासन था। 
  • राठौड़ों की उत्पति को लेकर इतिहासकारों के अलग-अलग मत है। 
  • भाटो की पोथियों के अनुसार राठौड़ हिरण्यकश्यप की संतान है। 
  • जोधपुर राज्य की ख्यात में इन्हें राजा विश्वतमान के पुत्र राजा वृहदबल से पैदा होना लिखा है दयालदास ने इन्हें सूर्यवंशी माना है तथा ब्राह्मण भल्लराव की संतान बताया है। 
  • नैणसी मारवाड़ के राठौड़ों को कन्नौज से आने वाली शाखा बताया है। 
  • कर्नल टॉड ने राठौड़ों की वंशावलियों के आधार पर इन्हें सूर्यवंशी बताया है। यद्यपि राठौड़ों की उत्पति के संबंध में इतिहासकारों की राय में मतभेद है, किन्तु सभी विद्वानों ने इन्हें दक्षिणी भारत के राष्ट्रकूटों से संबंधित बताया है। 


राठौड़ो की उत्पति

  1. कन्नौज ---------> गहड़वाल
  2. दक्षिण भारत ---> राष्ट्रकूट 

मेवाड़ का संपूर्ण इतिहास

 मेवाड़ का इतिहास राजस्थान का गौरवशाली इतिहास है । मेवाड़ में प्रताप जैसे प्रतापी राणा और पन्ना धाय जैसी देश भगत हुई है। । जिन्होंने अपने प्राणों का बलिदान अपने देश के लिए दिया था । राजस्थान का इतिहास प्रत्येक व्यक्ति के रगो में जोश और उत्साह भर देता है । ये इतिहास देशभक्ति की भावना को बड़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है 


राणा भीमसिंह (1784-1824 ई.) - मेवाड़ का इतिहास

  • राणा भीमसिंह ने अपनी पुत्री कृष्णकुमारी का विवाह मारवाड़ के शासक भीमसिंह के साथ तय किया। दुर्भाग्यवश शादी से पहले ही मारवाड के भीमसिंह की मृत्यु हो गयी। भीमसिंह की मृत्यु उपरांत कृष्णाकुमारी का विवाह आमेर के जगतसिंह द्वितीय के साथ तय किया गया। मारवाड़ के नये शासक मानसिंह ने भीमसिंह के भ्राता होने के कारण इस संबंध का विरोध किया ।
  • इस घटना के कारण आमेर एवं मारवाड़ रियासत परस्पर विरोधी हो गयी एवं 1807 ई. में जगतसिंह द्वितीय एवं मानसिंह के मध्य गिंगोली का युद्ध (परबतसर का युद्ध हुआ ।
  • लम्बे समय तक चले इस युद्ध में दोनों ही पक्षों में भयंकर खून-खराबा हुआ।

 गिंगोली (परबतसर) का युद्ध (नागौर)-1807 

  • जगत सिंह द्वितीय (जयपुर) V/S मानसिंह (जोधपुर)
  • अमीर खाँ पिंडारी (टोंक) तथा अजीत सिंह चुण्डावत (सलूम्बर) के कहने पर कृष्णाकुमारी को जहर देकर इस विवाद का अन्त किया गया। (21 जुलाई 1810 ई.)
  • 13 जनवरी 1818 ई. में भीमसिंह अंग्रेजों के साथ संधि कर लेता है। इस सन्धि में अंग्रेजों का प्रतिनिधि चार्ल्स मेटकॉफ तथा मेवाड का प्रतिनिधि अजीत सिंह था। कर्नल जेम्स टॉड को मेवाड का प्रथम पॉलिटिकल एजेन्ट बनाया गया।




जगत सिंह द्वितीय (1734-1751) - मेवाड़ का इतिहास

 हुरडा सम्मेलन ( भीलवाड़ा) - 17 जुलाई 1734

  • यह राजस्थान के राजपूत राजाओं का मराठों के खिलाफ सम्मेलन था ।

  1. मेवाड़ - जगत सिंह द्वितीय ( अध्यक्ष)
  2. जयपुर - सवाई जयसिंह 
  3. मारवाड़ - अभय सिंह
  4. नागौर  -  बख्त सिंह
  5. बीकानेर  -  जोरावर सिंह
  6. बूंदी  -  दलेल सिंह 
  7. कोटा  -  दुर्जन सिंह
  8. किशनगढ़  -  राजसिंह
  9. करोली  -  गोपाल पाल


सम्मेलन में निर्णय

  • सभी राजा मराठों के खिलाफ एक दूसरे की सहायता करेंगे
  • वर्षा ऋतु समाप्त होने के बाद रामपुरा ( कोटा ) में मराठों के खिलाफ युद्ध किया जायेगा ।

सम्मेलन का महत्व

  • खानवा युद्ध के बाद राजस्थान के राजपूत राजाओं ने किसी अन्य शक्ति के खिलाफ एकता बनाने की कोशिश की ।
  • राजाओं में आपसी मतभेदों के कारण हुरडा सम्मेलन असफल हो गया था ।

उदयपुर में जगतनिवास महल का निर्माण करवाया। दरबारी विद्वान नेकराम ने जगत विलास नामक पुस्तक लिखी । जिसमे इस महल की प्रतिष्ठा का सविस्तार वर्णन है ।





संग्राम सिंह द्वितीय (1710 - 1734 ईस्वी) - मेवाड़ का इतिहास

संग्राम सिंह द्वितीय (1710 1734 ईस्वी)

  • मेवाड़ से मराठों ने चौथ प्राप्त किया (राजस्थान में पहली बार)। 
  • उदयपुर में सहेलियों की बाड़ी का निर्माण करवाया गया।
  • सीसारमा उदयपुर में वेदनाथ (शिव जी) मंदिर का निर्माण करवाया इसका निर्माण अपनी माता देव कुंवर हेतु करवाया गया था (1716ई) । 
  • वैद्यनाथ प्रशस्ति का लेखक रूप भट्ट है । 
  • इस प्रशस्ति से बांदनवाड़ा युद्ध (अजमेर) की जानकारी मिलती है इस युद्ध में संग्राम सिंह द्वितीय ने मुगल सेनापति रणबाज खान को हरा दिया था यह युद्ध पूर, मंडल और बदनोर परगने के कारण हुआ था ।


अमर सिंह द्वितीय (1698 1710 ई) - मेवाड़ का इतिहास

अमर सिंह द्वितीय 1698 1710 ईसवी

  • मेवाड़ में अमर शाही पगड़ी का प्रचलन आरंभ किया।
  • देबारी उदयपुर का समझौता (1708)
  • अमर सिंह द्वितीय (मेवाड़) + अजीत सिंह (मारवाड़ /जोधपुर) + सवाई जयसिंह (आमेर )
  • यह समझौता मुगल बादशाह बहादुर शाह प्रथम के खिलाफ किया गया था ।

समझौते की शर्ते 

  • अजीत सिंह तथा सवाई जय सिंह को उनके राज्य दिलवाने में मदद की जाएगी ।
  • अमर सिंह द्वितीय की बेटी चंद्र कवर की शादी सवाई जय सिंह से की जाएगी तथा चंद्र कंवर का बेटा आमेर का किला राजा होगा



जयसिंह (1680-1698) - मेवाड़ का इतिहास

 जयसिंह (1680-1698)

  • औरंगजेब से संधि कर राठौड़ सिसोदिया गठबंधन से अलग हो गया 
  • जजिया के बदले पूर, मंडल व बदनोर के परगने बादशाह को दे दिए हालांकि कालांतर में यह परगने पुनः मेवाड़ में मिल गए 
  • 1687 ईस्वी में उदयपुर में जयसमंद झील का निर्माण कार्य शुरू करवाया जो 1691 ईस्वी में पूर्ण हुआ इसके लिए गोमती, जामली , रूपारेल , वगार नदी को रोककर बनाया गया इसे ढेबर झील भी कहा जाता है ।
  • इसके समीप नर्मदेश्वर शिवालय स्थित है ।
  • जय सिंह ने यहां अपने परमार रानी कमला देवी के लिए महलों का निर्माण करवाया था जिसे रूठी रानी का महल भी कहा जाता है ।


इस झील में बाबा का मकबरा तथा पायरी नमक कई टापू स्थित है ।



राजसिंह ( 1652-1680 ) - मेवाड़ का इतिहास

 राजसिंह ( 1652-1680 )

  • चित्तौड़ किले का पुनर्निर्माण शुरू करवाया था तथा शाहजहां के खिलाफ आक्रामक नीति अपनाई ।इस समय शाहजहां ने सादुला खान को भेजकर इस पुनर्निर्माण को रुकवाया ।
  • उत्तराधिकार संघर्ष में राज सिंह ने औरंगजेब का साथ दिया था इस समय राज सिंह ने टीका दौड़ आयोजन करवाया तथा कई मुग़ल सेत्रों पर अधिकार कर लिया ।
  • औरंगजेब के जजिया कर का विरोध किया ।
  • औरंगजेब के खिलाफ जोधपुर में अजीत सिंह की सहायता की इसे राठौड़ सिसोदिया गठबंधन कहा जाता है ।
  • औरंगजेब के खिलाफ हिंदू देवी देवताओं की मूर्तियों की रक्षा की ।
  • औरंगजेब के खिलाफ हिंदू राजकुमारियो की रक्षा की।

( उदाहरण के लिए रुपनगढ़ अजमेर की राजकुमारी चारुमती से 1669 में औरंगजेब की इच्छा के विरुद्ध शादी की ।)


सहल कंवर / हाड़ी रानी

  • यह सलूंबर के सामंत रतन सिंह चुंडावत की हाड़ी रानी थी ।
  • अपने पति के निशानी मांगने पर इसने अपने सर काट दिया था यह घटना राज सिंह चारुमती के विवाह के समय हुई थी 
  • मेघराज की कविता -  सेनानी (निशानी)


सांस्कृतिक उपलब्धियां

मंदिर

  • श्रीनाथ मंदिर सिहाड़ (नाथद्वारा राजसमंद)  : श्रीनाथजी की मूर्ति गोविंदास तथा दामोदर मथुरा से लेकर आए थे 1672 ईसवी मे
  • द्वारकाधीश मंदिर कांकरोली राजसमंद
  • अंबा माता मंदिर उदयपुर


झीले

त्रिमुखी बावड़ी उदयपुर

  • तहसील का निर्माण इस झील का निर्माण राज सिंह की पत्नी राम रस्ते ने करवाया था इससे जया बावड़ी भी कहा जाता है।

जाना सागर तालाब उदयपुर

  • इसका निर्माण राज सिंह की माता जाना तेरा छोड़ ने करवाया था जाना सागर प्रशस्ति के प्रशस्ति कार कृष्ण भट्ट का पुत्र लक्ष्मीनाथ तथा लेखक उसका भाई भास्कर भट्ट था

राजसमंद झील राजसमंद


दरबारी विद्वान                -                  पुस्तक

  1. किशोर दास            -               राज प्रकाश
  2. सदाशिव भट्ट           -               राज रत्नाकर
  3. रणछोड दास           -      राज प्रशस्ति & अमर काव्य वंशावली
  4. कवी मान                 -               राजविलास
  5. गिरधर दास              -      सगत रासो ( प्रताप के छोटे भाई शक्ति                                                                    सिंह की जानकारी )
  6. कल्याण दास             -              गुण गोविंद 



राज प्रशस्ति

  • यह राजसमंद झील के पास नोचोकी नामक स्थान पर स्थित है। 
  • यह संस्कृत भाषा का सबसे बड़ा अभिलेख है ।
  • यह 25 पत्थर पर लिखी है ।
  • इस प्रशस्ति में बप्पा रावल से राज सिंह तक मेवाड़ की वंशावली, मुगल मेवाड़ संधि, प्रताप के भाई शक्ति सिंह की जानकारी मिलती है ।
  • इससे पृथ्वीराज रासो तथा गुरुकुल प्रणाली की जानकारी मिलती है ।
  • 1662 से 1676 तक राजसमंद झील का निर्माण अकाल राहत कार्यों के तहत करवाया गया ।


अमर काव्य वंशावली

  • इस पुस्तक में अमर सिंह द्वितीय की जानकारी है ।
  • यह प्रताप का छोटा भाई सत्य सिंह तथा प्रताप के घोड़े चेतक की जानकारी दे देता है ।



जगत सिंह प्रथम ( 1628- 1652 )

जगत सिंह प्रथम ( 1628- 1652 )

  • जग मंदिर महल का निर्माण कार्य पूरा करवाया ।
  • उदयपुर में जगदीश ( जगन्नाथ ) मंदिर का निर्माण करवाया इसे सपने में बना मंदिर कहा जाता है 
  1. यह मंदिर पंचायतन शैली में बना हुआ है
  2. जिसके वास्तुकार अर्जुन, भाणा और मुकुंद थे
  3. यहां पर कृष्ण भट्ट द्वारा रचित जगन्नाथ राय प्रशस्ति से हल्दीघाटी युद्ध की जानकारी मिलती है
      • इसकी धाय मा नैजू बाई ने उदयपुर में विष्णु मंदिर का निर्माण करवाया था जिसे नैजू बाई का मंदिर कहा जाता है 
      • जगत सिंह अपने दानवीरता के कारण प्रसिद्ध था ।





      करण सिंह ( 1620-1628 ) - मेवाड़ का इतिहास

       करण सिंह ( 1620-1628 )

      • उदयपुर में करण सिंह ने विलास दिलखुश महलों का निर्माण करवाया ।
      • जग मंदिर महल का निर्माण कार्य शुरू करवाया ( पिछोला झील में ) ।
      • अपने विद्रोह के समय खुर्रम जगमंदिर महलों में रुका था ।


      अमर सिंह प्रथम ( 1597 - 1620 ) - मेवाड़ का इतिहास

       अमर सिंह प्रथम ( 1597 - 1620 )


      • मुगल मेवाड़ संधि - 5 फरवरी 1615 ई.
      • यह संधि मुगल बादशाह जहांगीर और मेवाड़ के शासक अमर सिंह प्रथम के मध्य संपन्न हुई । 
      • मेवाड़ की तरफ से संधि का प्रस्ताव लेकर हरिदास तथा शुभकरण गए थे ।
      • मुगलों ने अपनी तरफ से खुर्रम शाहजहां ने संधि की थी ।


      संधि की शर्ते

      1. मेवाड़ का राणा मुगल दरबार में नहीं जाएगा ।
      2. मेवाड़ का युवराज मुगल दरबार में जाएगा ।
      3. मेवाड़ मुगलों को 1000 घुड़सवार की सहायता देगा ।
      4. चित्तौड़ का किला मेवाड़ को वापस लिया जाएगा लेकिन मेवाड़ इसका पुनर्निर्माण नहीं करवा सकता ।
      5. वैवाहिक संबंध स्थापित नहीं किए जाएंगे


      संधि का महत्व

      • सांगा व प्रताप के समय से चली आ रही स्वतंत्रता की भावना का पतन हुआ ।
      • युद्धों के बंद हो जाने से मेवाड़ में शांति व्यवस्था सुनिश्चित हुई जिससे कलात्मक गतिविधियों को बढ़ावा मिला ।
      • युवराज करण सिंह जहांगीर के दरबार में गया था । 
      • जहांगीर ने करण सिंह को 5000 का मनसबदार बनाया ।
      • जहांगीर ने करण सिंह अमर सिंह के मूर्तियां आगरा के किले के बाहर लगाई थी 
      • अंग्रेजी राजदूत शासकों के अनुसार बादशाह ने मेवाड़ के राणा को आपस में समझौते से अधीन किया न कि बल से । उसने उसको एक प्रकार की  बख्शिशो से ही अधीन किया ना कि जीत कर । उसको अधीन करने से बादशाह की आय में कोई वृद्धि नहीं हुई बल्कि उल्टा बादशाह को बहुत कुछ देना पड़ता था ।

      ( विलियम फॉस्टर द्वारा संपादित पुस्तक दी एम्बेसी ऑफ सर टॉमस रो से )

      • अमरसिंह इस संधि से निराश था वह नौ चौकी राजस्थान राजसमंद चला गया था ।
      • कालांतर में यहां पर राजसमंद झील का निर्माण करवाया था ।


      ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में 1630 ईसवी का शाहजहानी मस्जिद के अभिलेख से यह ज्ञात होता है कि शहजादा खुर्रम ने मेवाड़ के साथ संधि के बाद यह मस्जिद बनवाई थी ।


      • आहड़ उदयपुर में अमर सिंह की छतरी बनी हुई है अमर सिंह के बाद के सभी महाराणा की छतरियां आहड़ में ही स्थित है यह स्थान महासतिया कहलाता है ।




      महाराणा प्रताप ( 1572 - 1597 ई. ) - मेवाड़ का इतिहास

      महाराणा प्रताप ( 1572 - 1597 ई. )


      माता - जयवंता बाई सोनगरा ( पाली के अखैराज सोनगरा की पुत्री )

      जन्म - 9 मई 1540 ( जेष्ठ शुक्ल तृतिया विक्रमी संवत् 1597 ) 

      जन्म स्थान - कुंभलगढ़ 

      बचपन का नाम - कीका 

      रानी - अजब दे पंवार

      • प्रताप का पहला राज तिलक गोगुंदा में हुआ था सलूंबर के सामंत कृष्णदास चुंडावत ने किया था ।
      • प्रताप का विधिवत राजतिलक कुंभलगढ़ में हुआ था इस राजतिलक समारोह में मारवाड़ का चंद्रसेन भी आया था |
      अकबर ने प्रताप को समझाने के लिए चार दूत भेजे थे

      1. जलाल खान कोरची  -   सितंबर 1572 
      2. मानसिंह                  -    जून 1573 
      3. भगवानदास             -   सितंबर 1573 
      4. टोडरमल                -     दिसंबर 1573


      हल्दीघाटी राजसमंद का युद्ध 18 जून 1576 ई.

      प्रताप V/s अकबर

      प्रताप के सेनापति 

      1. कृष्ण दास चुंडावत ( सलूंबर )
      2. रामशाह तोमर ( ग्वालियर )
      3. हकीम खां सूर ( अफगान सरदार )
      4. पूंजा भील ( भीलों का सरदार )


      अकबर के सेनापति  

      1. मानसिंह ( प्रथम बार स्वतंत्र सेनापति )
      2. आसिफ खान


      युद्ध से पूर्व मुगल सेना मोलेला नामक गांव में और मेवाड़ की सेना लोसिंग नामक गांव में रुकी थी

      • चेतक के घायल होने के कारण प्रताप युद्ध भूमि से बाहर चला गया।
      • झाला मान बिदा ने युद्ध का नेतृत्व किया और वीरगति को प्राप्त हुआ |
      • मिहतर खान नामक सैनिक ने युद्ध में अकबर ने किस झूठी सूचना दी थी |
      • मानसिंह प्रताप को अकबर की सेना की अधीनता स्वीकार करवाने में सफल रहा |
      • अकबर ने मानसिंह और आसफ खान का दरबार में आना बंद करवा दिया |
      • चेतक की छतरी बलीचा ( राजसमंद ) में बनी है |
      • हल्दीघाटी युद्ध में प्रताप की तरफ से लूणा व रामप्रसाद नामक हाथी ने भाग लिया था जबकि अकबर की तरफ से मर्दाना और गजमुक्ता नामक हाथी उपस्थित थे रामप्रसाद को मुगल सेना ने पकड़ लिया तथा नाम बदलकर पीर प्रसाद कर दिया था

               इतिहासकार                   -                    हल्दीघाटी युद्ध के नाम

      1. अबुल फजल                           -                         खमनोर का युद्ध 
      2. बदायूनी                                  -                         गोगुंदा का युद्ध 
      3. जेम्स टॉड                                -                         मेवाड़ की थर्मोपोली 
      4. आदर्श लाल श्रीवास्तव              -                         बादशाह बाग का युद्ध

      बदायूंनी ने हल्दीघाटी युद्ध में भाग लिया था ( पुस्तक मुंतखब - उत - तवारीख )

      • बदायूंनी ने लिखा है कि प्रताप का पीछा करने का न तो साहस था और न हीं शक्ति । उसके अनुसार मुगलों को भय था कि प्रताप की सेना पहाड़ों में घात लगाए ने बैठी हो अतः प्रताप का पीछा करने की बजाय वापस प्रस्थान करना श्रेयस्कर माना । जहां मुगल सेना को भी लोगों ने बहुत परेशान किया उनकी रसद सामग्री को वे लूट कर ले गए।


      हल्दीघाटी युद्ध का महत्व

      • यह साम्राज्यवादी शक्तियों के खिलाफ प्रादेशिक स्वतंत्रता का संघर्ष था । 
      • प्रताप ने कम संसाधनों के बावजूद अकबर से संघर्ष किया जिससे मेवाड़ की जनता में आशा व नैतिकता का संचार हुआ । 
      • इस युद्ध ने मेवाड़ की सामान्य जनता व जनजातियों में राष्ट्रवादी भावनाओं का संचार किया । 
      • यह युद्ध आज भी राष्ट्रवादियों के लिए प्रेरणा का स्रोत का कार्य करता है । 
      • बदायूनी का उपयुक्त कथन मानसिंह की अकबर द्वारा दरबार में उपस्थिति की मनाही स्वयं अकबर द्वारा मेवाड़ पर आक्रमण के लिए आना तथा घटनाओं का विश्लेषण करने से स्पष्ट है कि हल्दीघाटी युद्ध में प्रताप का पलड़ा भारी पड़ रहा था उसने मुगलों के अजय होने का भ्रम तोड़ दिया । 
      • 1576 ईस्वी में अकबर ने मेवाड़ पर आक्रमण किया तथा उसने उदयपुर का नाम बदलकर मुहम्मदाबाद कर दिया

      कुंभलगढ़ का युद्ध 

      • मुगल सेनापति शाहबाज खान ने कुंभलगढ़ पर 3 बार आक्रमण किए ( 1577, 1578, 1579 )


      शेरपुर की घटना ( उदयपुर ) 1580 

      • अमर सिंह ने अब्दुल रहीम मुगल सेनापति की बैगमों को गिरफ्तार कर लिया था लेकिन प्रताप ने उन्हें ससम्मान वापस भिजवाया


      दिवेर ( राजसमंद ) का युद्ध 1582 इसवी 

      • मुगल सेना ने चार स्थानों पर अपने थाने स्थापित किए थे |
      1. दिवेर
      2. देवल
      3. देवारी
      4. देसूरी 
      • प्रताप ने मुगल सेना को हरा दिया |
      • अमर सिंह ने मुगल सेनापति सुल्तान खान को मार दिया |
      • जेम्स टॉड ने इस युद्ध को राजस्थान का मैराथन कहा था |
      • प्रतापगढ़ बांसवाड़ा तथा किधर रियासतो ने प्रताप का साथ दिया था |


      राणा उदयसिंह (1537 - 1572 ) - मेवाड़ का इतिहास

      राणा उदयसिंह (1537 - 1572 ) - मेवाड़ का इतिहास

      पिता - राणा सांगा 

      माता - कर्मावती



      मावली उदयपुर का युद्ध - 1540ई.

      • इस युद्ध में उदय सिंह ने बनवीर को हरा दिया था 1544 ई. मैं मारवाड़ से लौटते समय शेरशाह सूरी चित्तौड़ की तरफ मोडा लेकिन उदयसिंह से संधि कर ली ।


      हरमाड़ा अजमेर का युद्ध - 1557 ई.

      ( उदय सिंह V/S हाजी खान पठान अजमेर )

      • मालदेव जोधपुर ने हाजी खां पठान का साथ दिया और उदय सिंह को हरा दिया


      मालदेव खेरवा ( पाली ) के जैतसिंह झाला की राजकुमारी से शादी करना चाहता था लेकिन जैतसिंह ने उसका विवाह उदयसिंह से करवा दिया अतः मालदेव व उदयसिंह में विवाद था । उदय सिंह ने उस झाली रानी के लिए कुंभलगढ़ में महल बनवा झाली रानी का मालिया के नाम से प्रसिद्ध है ।


      • 1559 में उदयपुर शहर बसाया गया तथा यहां सर्वप्रथम पानेरा महल बनवाए गए जहां कालांतर में मेवाड़ के शासकों का राजतिलक किया जाता था
      •  पहले उदय सिंह आहट शहर बसाना चाहता था तथा वहां मोती महल का निर्माण भी करवा लिया था परंतु बाद में एक साधु के कहने पर नए नगर उदयपुर की स्थापना की थी 
      • उदयसागर झील का निर्माण करवाया 
      • 1567 - 68 में अकबर ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया था 
      • उदय सिंह गरवा की पहाड़ियों ( उदयपुर ) में चला गया 
      • चित्तौड़ की जिम्मेदारी जयमल - पत्ता को दी गई 
      • जयमल अकबर की संग्राम नामक बंदूक की गोली से घायल हो गया था |
      • जयमल कला राठौड़ के कंधों पर बैठकर युद्ध किया था इसलिए कला राठौड़ को चार हाथो का देवता कहा जाता है 
      • 1568 में चित्तौड़ का तीसरा शाखा हुआ फुल कवर के नेतृत्व में जोहर किया गया 
      • अकबर ने 15 फरवरी 1568 को चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया उसने चित्तौड़ में 30000 लोगों का कत्लेआम किया इसके बाद सिक्का एलजी प्रचलित किया 
      • अकबर जयमल और पत्ता की वीरता से प्रभावित होकर उनकी मूर्तियां आगरा के किलें में लगवाई 
      • फ्रांसीसी यात्रियों का वर्णन किया है 
      • पुस्तक - Travels in the Mughal Empire


      जयमल 

      • मेड़ता का राजा 
      • 1562 में अकबर ने मेड़ता पर अधिकार कर लिया था

      पता 

      • आमेट का सामंत ( राजसमंद )
      • आमेट मेवाड़ का प्रथम ठिकाना था

      फुल कवर 

      जयमल की बहन और पत्ता की रानी


      • जयमल तथा कला राठौड़ के छतरिया हनुमान पोल में भैरव पोल चित्तौड़ के मध्य स्थित है तथा पत्ता की छतरी रामपोल चित्तौड़ पर बनी हुई है |
      • 28 फरवरी 1572 ई. को होली के दिन गोगुंदा में उदय सिंह की मृत्यु हो गई 
      • गोगुंदा में उदय सिंह की छतरी बनी हुई है 
      • उदय सिंह ने अपने बड़े बेटे प्रताप को राजा नहीं बनाया बल्कि छोटे बेटे जगमाल को राजा बनाया था
      • बीकानेर के जूनागढ़ में राय सिंह ने सूरजपोल पर जयमल और पत्ता की मूर्तियां लगवाई थी

      महाराणा विक्रमादित्य ( 1531 - 1536 ) - मेवाड़ का इतिहास

      महाराणा विक्रमादित्य ( 1531 - 1536 ) - मेवाड़ का इतिहास 

      • पिता - राणा सांगा 
      • माता - कर्मावती ( हाड़ी रानी - बूंदी )
      • संरक्षक - कर्मावती


      1. 1533 में गुजरात के बहादुरशाह ने मेवाड़ पर आक्रमण किया कर्मावती ने रणथंभोर का किला देकर संधि कर ली थी ।
      2. 1534 - 35 ईसवी में पुनः बहादुर शाह ने आक्रमण किया ।
      3. कर्मावती ने मुगल बादशाह हुमायूं को राखी भेजी और सहायता मांगी थी ।
      4. 1535 में मेवाड़ का दूसरा साखा हुआ रानी कर्मावती ने जोहर और देवलिया ( प्रतापगढ़ ) के बाघ सिंह ने केसरिया किया था ।
      5. बाघ सिंह की छतरी पांडुपोल ( चितौड़ गढ़ ) में बनी हुई है ।
      6. 1535 ई. के पुरताम्रपत्र से कर्मावती के जोहर की जानकारी मिलती है ।


      बाग सिंह ने खानवा के युद्ध में भी भाग लिया था ।
      1. बनवीर को मेवाड़ का शासक बनाया गया ।
      2. बनवीर उड़ना राजकुमार पृथ्वीराज की दासी का पुत्र था ।
      3. बनवीर ने विक्रमादित्य की हत्या कर दी थी 
      4. वह उदय सिंह को भी मारना चाहता था लेकिन पन्नाधाय ने अपने पुत्र चंदन का बलिदान देकर को बचा लिया ।
      5. कुंभलगढ़ आशा देवपूरा ने पन्नाधाय व उदयसिंह को शरण दी ।

      राणा सांगा ( संग्राम सिंह) (1509-1528 ई.) - मेवाड़ का इतिहास

      • यह रायमल का बेटा था ।
      • अपने भाइयों से विवाद होने के बाद सांगा श्रीनगर ( अजमेर ) में करमचंद पवार के पास शरण ली ।
      • रायमल की मृत्यु के बाद सांगा मेवाड़ का राजा बना ( 5 मई 1509 ) ।
      • जिस समय सांगा राजा बना उस समय दिल्ली में सिकंदर लोदी, गुजरात में महमूद शाह बेगड़ा और मालवा में नासिर शाह का राज था ।



      दिल्ली v/s सांगा

      • सांगा ने दिल्ली के इब्राहिम लोदी से युद्ध लड़े ।
      • सांगा और इब्राहिम लोदी के मध्य प्रथम युद्ध 1517 में खातोली ( कोटा ) में हुआ तथा दूसरा युद्ध 1518 ईस्वी में बाड़ी ( धौलपुर ) में हुआ ।
      • इन दोनों युद्धों में सांगा जीत गया था।


      मालवा V/S सांगा

      संघर्ष के कारण

      • सांगा उत्तरी भारत में प्रभाव स्थापित करना चाहता था इसके के लिए मालवा पर अधिकार आवश्यक था ।
      • मालवा की आंतरिक स्थिति कमजोर थी जो सांगा के लिए अनुकूल अवसर थी ।
      • चंदेरी की मोदीनिराय ने सांगा से महमूद खिलजी द्वितीय के खिलाफ सहायता मांगी थी


      गागरोन का युद्ध 1519 

      सांगा V/s महमूद खिलजी द्वितीय

      1. इस समय गागरोन का किला चंदेरी ( मालवा ) के राजा मोदीनिराय के पास था ।
      2. सांगा जीत गया ।
      3. हरिदास चारण ने महमूद खिलजी द्वितीय को गिरफ्तार कर लिया इसलिए सांगा ने उसे 12 गांव दिए थे ।
      4. मुस्लिम लेखक निजामुद्दीन के अनुसार लड़ाई में फतह पाने के बाद दुश्मन को गिरफ्तार कर के पीछे उसका राज्य दे देना यह काम आज तक मालूम नहीं किसी दूसरे ने किया है ।


      गुजरात V/s सांगा


      संघर्ष के कारण

      • सांगा के राज्य विस्तार की नीति ।
      • कुम्भा समय से मेवाड़ गुजरात के मध्य संघर्ष चल रहा था ।
      • गुजरात के मुजफ्फरशाह द्वितीय ने सांगा के खिलाफ महमूद शाह खिलजी द्वितीय की सहायता की थी ।
      • नागौर का मुस्लिम राज्य सांगा का करद था तथा गुजरात का सुल्तान उसे स्वतंत्र करना चाहता था ।
      • तत्कालीन कारण : इधर का उत्तराधिकार संघर्ष 

      रायमल के पुत्र - मेवाड़ का इतिहास

      पृथ्वीराज

      • यह रायमल का पुत्र था । 
      • इसे उड़ना पृथ्वीराज भी कहते है। 
      • इसकी रानी तारा के नाम पर अजमेर किले का नाम तारागढ़ रखा गया । 
      • पृथ्वीराज की छतरी कुंभलगढ में हैं। ( 12 खम्भे)


      जयमल

      • यह रायमल का बेटा था। 
      •  यह सोलंकियों के खिलाफ लड़ता हुआ मारा गया ।


      सांगा 

      • यह रायमल का बेटा तथा मेवाड़ का राणा बना ।





      रायमल ( 1473 - 1509 ) - मेवाड़ का इतिहास

      • अपने भाई उदा को हराकर ( जावर व दाडीमपुर के युद्ध में ) मेवाड़ का शासक बना । 
      • उदा ने मालवा के सुल्तान गयासशाह से सहायता प्राप्त करने की कोशिश की परंतु बिजली गिरने से उसकी मृत्यु हो गई ।
      • मालवा के सुल्तान गयासशाह को पराजित किया है इसकी जानकारी 1488 के एकलिंग प्रशस्ति से प्राप्त होता है ।



      सांस्कृतिक उपलब्धियां

      1. चित्तौड़ में अद्भुत ( अदबद जी ) का मंदिर बनाया ।
      2. एकलिंग जी मंदिर ( कैलाशपुरी - नागदा ) का वर्तमान स्वरूप बनाया ।
      3. इसकी बहन रमाबाई ने जावर में रामास्वामी नामक मंदिर व एक कुंड बनाया ।
      4. इसकी रानी श्रृंगार कवर ने घोसुंडी चित्तौड़ में बावड़ी का निर्माण करवाया यहां लगी प्रशस्ति में श्रृंगार कवर के पति व पिता ( जोधा ) के वंशजों का अन्य परिचय दिया गया है ।



      घोसुंडी अभिलेख

      • यह दूसरे शताब्दी ईसा पूर्व का अभिलेख है ।
      • यह वैष्णव ( भागवत ) धर्म की जानकारी देने वाला राजस्थान का प्राचीनतम ग्रंथ है ।
      • इस अभिलेख के अनुसार गज वंश के राजा सर्वतात ने अश्वमेघ एक कराया था ।



      राणा कुम्भा (1433 - 1468 ई.) - मेवाड़ का इतिहास

      • पिता - मोकल
      • माता - सौभाग्यवती परमार
      • संरक्षक - रणमल
      • रणमल की सहायता से अपने पिता की मौत का बदला लिया ।
      • मेवाड़ में रणमल का प्रभाव बढ़ गया तथा सिसोदिया के नेता राघवदेव ( चुंडा का भाई ) को मरवा दिया 
      • हंसाबाई ने चूंडा को मालवा से वापस बुला लिया 
      • भरमाली की सहायता से रणमल को मार दिया
      • रणमल का बेटा जोधा भाग गया और बीकानेर के पास का काहूनी नामक गांव मे शरण ली
      • चुंडा ने राठौड़ों की राजधानी मंडोर ( जोधपुर ) पर अधिकार कर लिया ।



      आवंल - बांवल की संधि ( 1453 ई.)

      जोधा + कुम्भा

      • सोजत ( पाली ) को मेवाड़ व मारवाड़ की सीमा बनाया गया 
      • जोधा को मंडोर वापस दे दिया गया 
      • कुंभा के बेटे रायमल और जोधा की पुत्री श्रृंगार कंवर की शादी कर दी गई।


      सारंगपुर का युद्ध ( 1437 ई.)

      कारण :-

      • महमूद खिलजी ने मोकल के हत्यारों ( चाचा, मेरा व महपा पवार ) को शरण दी 
      • कुंभा ने महमूद खिलजी के विरोधी उमर खान को सैन्य सहायता देकर सारंगपुर पर अधिकार करवा दिया 
      • कुंभा तथा महमूद खिलजी की विस्तार वादी महत्वकांक्षाए ।
      • कुम्भा जीत गया और उसने महमूद खिलजी को गिरफ्तार कर लिया था इस जीत की याद में चित्तौड़ में विजय स्तंभ बनाया गया ।


      चंपानेर की संधि (1456 ई)

      उद्देश्य :-

      • राणा सांगा को हराकर चित्तौड़ के दक्षिण भाग पर गुजरात तथा खासभाग तथा अहीरवाड़ा पर मालवा का अधिकार करना 
      • महमूद खिलजी का प्रतिनिधि ताज खान कुतुबद्दीन शाह से मिला था


      बदनोर (भीलवाड़ा ) का युद्ध (1457 ई.)

      • कुम्भा ने मालवा तथा गुजरात की संयुक्त सेना को हराया कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति और रसिक प्रिया से यह जानकारी मिलती है
      • कुंभा ने सिरोही के सहसमल देवड़ा को हराया । सहसमल देवड़ा ने गुजरात के कुतुबुद्दीन शाह की सहायता की थी इस समय कुंभा ने नरसिंह डोडीया के नेतृत्व में सेना भेजी थी


      नागौर का उत्तराधिकार संघर्ष

      फिरोज खान की मृत्यु के बाद उसके बेटे शम्स खान तथा छोटे भाई मुजाहिद खान में उत्तराधिकार का संघर्ष हो गया था जिसमें कुंभा शम्स खान की सहायता करता है और मुजाहिद खान को हरा देता है कालांतर में शम्स खान ने नागौर में किलेबंदी आरंभ कर दी अतः कुंभा ने नागौर पर हमला किया व शम्स खान भागकर गुजरात के कुतुबुद्दीन शाह के पास चला गया और अपनी पुत्री की शादी उससे करवा दी कुतुबुद्दीन शाह व शम्स खान ने मिलकर चित्तौड़ पर आक्रमण किया लेकिन कुंभा ने इन्हें हरा दिया इसी प्रकार नागौर का उत्तराधिकार संघर्ष मेवाड़ और गुजरात के बीच विवाद का कारण बना ।



      कुम्भा की सांस्कृतिक उपलब्धियां


      A.स्थापत्य कला 

      कुंभा को स्थापत्य कला का जनक कहा जाता है ।


      1. विजय स्तंभ 

      राणा मोकल (1421 - 1433 ई.) - मेवाड़ का इतिहास

      • पिता - राणा लाखा
      • माता - हंसाबाई 
      • प्रथम संरक्षक - चुंडा
      • हंसा बाई के अविश्वास के कारण चुंडा मेवाड़ छोड़कर मालवा चला गया ( मालवा का सुल्तान - होशंगशाह ) ।
      • द्वितीय संरक्षक - रणमल ( हंसा बाई का भाई )
      • मोकल ने एकलिंग जी के मंदिर का परकोटा चारदीवारी बनवाया ।
      • चित्तौड़ में समद्वेश्वर मंदिर का पुनः निर्माण करवाया । पहले इस मंदिर को ' त्रिभुवन नारायण ' मंदिर कहा जाता था इसे भोज परमार ने बनवाया था ।
      • चित्तौड़ में जलाशय सहित द्वारकानाथ ( विष्णु ) का मंदिर बनवाया ।
      • अपनी बाघेला रानी गोरांबिक की मुक्ति के लिए श्रृंगी ऋषि के स्थान पर बावड़ी का निर्माण करवाया । 
      • भाई बाग सिंह के नाम पर बाघेला तालाब बनवाया ।
      • 1433 में गुजरात के अहमद शाह पर आक्रमण किया । इस समय चाचा, मेरा और मेहता पवार ने जीलवाड़ा ( राजसमंद ) नामक स्थान पर मोकल की हत्या कर दी ।



      हस्तिकुंडी अभिलेख ( 977 ई.)

      बीजापुर ( पाली ) के पास हस्ती कुंडली नामक स्थान से प्राप्त हुआ इसके अनुसार जब मालवा के परमार राजा मूंज ने मेवाड़ पर चढ़ाई की और आहट को तोड़ दिया उस समय मेवाड़ की सहायता राठौड़ राजा मम्मट के पुत्र धवल ने की इस समय मेवाड़ का शासक शक्ति कुमार था ।


      श्रृंगी ऋषि अभिलेख ( 1428 ई. )

      1. उदयपुर में एकलिंग जी के समीप यह अभिलेख प्राप्त हुआ यह मेवाड़ के राणा मोकल के समय का है इसके अनुसार मोकल ने अपनी बाघेला रानी गोरांबिका की मुक्ति के लिए कुंड बनवाया ।
      2. इसमें हम्मीर से लेकर मोकल तक की जानकारी मिलती है ।
      3. हम्मीर ने जिलवाड़ा , इडर, पालनपुर को जीता तथा भीलों को हराया 
      4. क्षेत्रसिंह (जैत्रसिंह) ने मालवा के अमीशाह को हराया ।
      5. लक्षसिंह (राणा लाखा) ने काशी, प्राग व गया को कर मुक्त कराया । 
      6. मोकाल ने नागौर के फिरोज खान व गुजरात के अहमद शाह को हराया मोकल ने 25 तुला दान किए जिसमें एक पुष्कर के वराह मंदिर में किया मोकल ने कुंड निर्माण की आज्ञा गुरुदेव त्रिलोचन से प्राप्त की व अन्य रानी मायापुरी के साथ प्रतिष्ठा समारोह में भाग लिया ।

      राणा लाखा ( लक्षसिंह ) (1382 - 1421 ई. ) - मेवाड़ का इतिहास

      •  जावर उदयपुर में चांदी की खान प्राप्त हुई ।
      • एक बंजारे ने पिछोला उदयपुर जेल का निर्माण करवाया (बंजारे - घुमक्कड़ व्यापारी )
      • कुंभा हाडा नकली बूंदी की रक्षा करते हुए मारा गया था ।
      • मारवाड़ के चुंडा ने अपनी बेटी हंसा बाई की शादी मेवाड़ के राणा लाखा से की ।
      • मेवाड़ के राणा लाखा के पुत्र चुंडा ने प्रतिज्ञा ली कि वह मेवाड़ का अगला राजा नहीं बनेगा बल्कि हंसा बाई के पुत्र को राजा बनाएगा इसलिए चुंडा को मेवाड़ का भीष्म भी कहा जाता है ।





      चुंडा के त्याग के कारण दिए गए विशेष अधिकार

      1. मेवाड़ के 16 ठिकानों में से प्रथम श्रेणी के 4 ठिकाने दिए गए इनमें सलूंबर ( उदयपुर ) भी शामिल था जो मेवाड़ का सबसे बड़ा ठिकाना था ।
      2. सलूंबर का सामंत मेवाड़ के राजा का राजतिलक करेगा ।
      3. सलूंबर का सामंत मेवाड़ की सेना का सेनापति होगा ।
      4. मेवाड़ के सभी राज्य पत्रों पर राणा के साथ सलूंबर का सामंत भी हस्ताक्षर करेगा ।
      5. राणा की अनुपस्थिति में सलूंबर का सामंत राजधानी को संभालेगा ।




      हरावल - सेना का अगला भाग 

      चंदावल - सेना का पिछला भाग

      हम्मीर ( 1326 - 1364 ई.) - मेवाड़ का इतिहास

      रतन सिंह ( 1302 - 1303 ) - मेवाड़ का इतिहास

       दिल्ली के अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण



      आक्रमण के कारण

      • सुल्तान की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा ।
      • चित्तौड़ का सामरिक महत्व ( सुदृढ़ पहाड़ी, विशाल प्राचीर, अन - जल का भंडार ) ।
      • चित्तौड़ के व्यापारिक महत्व ( दिल्ली से गुजरात वह मालवा मार्ग पर स्थित ) ।
      • मेवाड़ का बढ़ता प्रभाव ।
      • सुल्तान के प्रति प्रतिष्ठा का प्रश्न ( सुल्तान के गुजरात जाते समय रतन सिंह के पिता समर सिंह ने उससे मार्ग कर लिया था ) ।
      • रतन सिंह की पत्नी पद्मिनी को प्राप्त करने की लालसा ।
      • 1303 में चित्तौड़ का प्रथम साखा हुआ जिसमें रानी पद्मिनी और अन्य 1600 महिलाओं ने जौहर किया तथा रतन सिंह अपने सेनापति गोरा और बादल सहित केसरिया किया । ( मेवाड़ का प्रथम साका )
      • 25 अगस्त 1303 को सुल्तान ने चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया तथा अगले दिन 30,000 निर्दोष नागरिकों का नरसंहार करवाया ।
      • सुल्तान ने अपने पुत्र खिज्र खान को चित्तौड़ सौंपकर इसका नाम खिज्राबाद कर दिया ।
      • सुल्तान के दरबारी इतिहासकार अमीर खुसरो ने अपनी पुस्तक ' खजाइन - उल - फूतूह ' ( तारीख - ए - अलाई ) में इस आक्रमण का आंखों देखा वर्णन किया है ।
      • 1325 ई. के चित्तौड़ के धाईबी पीर की दरगाह में फारसी अभिलेख में चित्तौड़ का नाम खिज्राबाद मिलता है ।


      खिज्रखान ने गंभीरी नदी पर पुल बनवाया । 

      उसने चित्तौड़ की तलहटी में मकबरे का निर्माण करवाया जिसके फारसी अभिलेख (1310 ई.) में अलाउद्दीन खिलजी को दूसरा सिकंदर, ईश्वर की छाया और संसार का रक्षक कहा गया है ।


      बाद में चित्तौड़ मालदेव सोनगरा मुछाला मालदेव को सौंप दिया गया ।



      मालदेव सोनगरा

      यह जालौर के शासक कांड जो सोनगरा का भाई था 1311 ई. में जालौर के पतन के बाद मालदेव सोनगरा सुल्तान की सेवा में चला गया ।


      1540 ई. में मलिक मोहम्मद जायसी द्वारा अवधी भाषा में लिखित पद्मावत महाकाव्य में महारानी पद्मिनी को सीहल द्वीप की राजकुमारी बताया और इसके अनुसार पिता गंधर्वसेन और माता चंपावती थी राघव चेतन नामक ब्राह्मण ने अलाउद्दीन को पद्मिनी के बारे में बताया ।


      अबुल फजल ( अकबरनामा ), फरिश्ता ( गुलशन - ए - इब्राहिमी ), हाजी उद्दावीर (जफरुलवली), कर्नल टॉड, मोहनोत नैनसी, दशरथ शर्मा ने कुछ फेरबदल के साथ इस कहानी को स्वीकार किया ।


      सूर्यमल मिश्रण ने इससे नहीं स्वीकारा ।


      रतन सिंह रावल वंश का अंतिम राजा था ।


      जैत्रसिंह ( 1213 - 1253 ) - मेवाड़ का इतिहास

       भूताला का युद्ध ( 1227 ई.)



      • भुताला ( उदयपुर ) के युद्ध में जैत्रसिंह ने दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश ( रजिया सुल्तान के पिता ) को हराया ।
      • यह जानकारी जयसिंह सूरी की पुस्तक ' हमीर मदमर्दन' में मिलती है ।
      • इल्तुतमिश को हमीर ने हराया परंतु इल्तुतमिश की सेना ने नागदा को तहस-नहस कर दिया इसलिए जैत्रसिंह ने राजधानी चित्तौड़ ( परमारो से छीनकर ) बनाई ।
      • डॉ दशरथ शर्मा इनके शासन को मेवाड़ का स्वर्ण काल मानते हैं ।
      • गौरीशंकर हीराचंद ओझा के अनुसार दिल्ली के गुलाम वंश के समय मेवाड़ में सबसे प्रभावी व वीर राजा जैत्रसिंह ही था उसकी प्रशंसा उनके विरोधियों ने भी की थी ।



      जयसिंह सूरी धोलका ( गुजरात ) के बघेल ( सोलंकी ) राजा वीरधवल के मंत्रियों ( वस्तूपाल - तेजपाल ) का कृपापात्र था इसलिए हमीर मदमर्दन में वीर धवल की प्रशंसा की है ।

      अल्लट - मेवाड़ का इतिहास

       अन्य नाम 

      आलुरावल



      • इन्होंने आहङ को अपनी दूसरी राजधानी बनाया था वहां वराह (विष्णु) मंदिर का निर्माण कराया एवं मेवाड़ में नौकरशाही (प्रशासनिक व्यवस्था) की स्थापना की । (सारणेश्वर प्रशस्ति के अनुसार)
      • आटपुर (आहड़) से प्राप्त शक्ति कुमार के अभिलेख (977 A.D.) के अनुसार अल्लट की माता महालक्ष्मी राठौर (राष्ट्रकूट) वंश की थी तथा पत्नी हरिया देवी हूण राजकुमारी थी हरिया देवी ने हर्ष पुर नाम के गांव की स्थापना की थी


      सारणेश्वर प्रशस्ति

      • यह प्रशस्ति उदयपुर के सारणेश्वर से प्राप्त पहले आहड़ के वराह मंदिर में स्थित थी । 
      • इसमें अल्लट की माता महालक्ष्मी, उसकी पत्नी हरिया देवी, उसके पुत्र नरवाहन तथा स्वयं अल्लट के बारे में जानकारी प्राप्त होती है ।
      • इसमें अल्लट अधिकारियों के नाम पद सहित उल्लेखित हैं । 
      • वराह मंदिर के गोष्ठिको (चंदा देने वाले) की नामावली भी है । 
      • तत्कालीन कर प्रणाली तथा मंदिर के निर्वाह व्यवस्था की जानकारी मिलती है । 
      • उस समय आहट में कर्नाटक, मध्यप्रदेश, पलाट ( गुजरात ) टक्क (पंजाब) के व्यापारी भी रहते थे ।





      जैत्रसिंह 

      बप्पा रावल - मेवाड़ का इतिहास

      वास्तविक नाम 

            काल भोज


      विजय अभियान

      1. नागदा में हरित ऋषि की गायों को चराते थे बप्पा रावल उनके आशीर्वाद से चित्तौड़ पर आक्रमण किया चित्तौड़ के मान मोरी को हराकर चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया (734 A.D.)
      2. नागदा के कैलाशपुरी में एकलिंग जी का मंदिर बनवाया
      3. पाकिस्तान में रुकने वाले स्थान का नाम बप्पा रावल के नाम पर रावलपिंडी पड़ गया
      4. गजनी के सलीम पर आक्रमण कर वहां अपने भांजे को राजा बनाया ।
      C.V. वैध (चिंतामणि विनायक वैद्य) ने बप्पा रावल की तुलना चार्ल्स माटेल (यूरोप) से की

      उपाधियां

      1. हिंदू सूर्य
      2. राजगुरु - मुगलों को हराने वाला
      3. चक्कवे - चक्रवर्ती



      कविराज श्यामलदासजी ने बप्पा को उपाधि बताया था




      अल्लट 











      मेवाड़ - राजस्थान का इतिहास

       भौगोलिक विस्तार

      1. चित्तौड़गढ़ 
      2. राजसमंद 
      3. भीलवाड़ा 
      4. उदयपुर 
      5. प्रतापगढ़





      मेवाड़ के प्राचीन नाम

      1. मैनपाट (मेव मेर मेद जाति के कारण) 
      2. प्राग वाट (पहाड़ी क्षेत्र)
      3. शिवि जनपद

      गुहिल वंश 

      1. सूर्यवंशी हिंदू
      2. 24 शाखाएं - मेवाड़, वागड़, चाकसू/चाटसू, कल्याणपुर, महाराष्ट्र, नेपाल

      सामोली अभिलेख

      1. यह उदयपुर के पास में मिला है।
      2. शिलादित्य के बारे में जानकारी मिलती है इसमें ।
      3. वटनगर ( बसंतगढ़ ) की महाजन समुदाय ( बनिए ) के महंतर ( प्रमुख ) ने समुदाय के कहने पर अरण्यवासिनी (जावर माता) का मंदिर बनवाया व स्वयं देव बुक नामक स्थान पर अग्नि में प्रवेश कर लेता है ।
      4. 1869 में आगरा के पास 2000 चांदी के सिक्के मिले जिन पर श्री गुहिल नाम लिखा था ।


      इतिहासकारों की कहानियां
      1. जेम्स टॉड ने गुजरात के वडनगर के शिलादित्य और पुष्पावती का पुत्र बताया
      2. अबुल फजल ने ईरान के नौशेरवा खान आदिल के वंशज बताया

      कक्षा 6 की प्रश्नावली 1 का NCERT Solution

      कक्षा 6 की प्रश्नावली 1 का NCERT Solution

      कक्षा 6 की प्रश्नावली 1 गणित एक महत्वपूर्ण हिस्सा है । इसमें हम जोड़ना ,  घटाना और व्यापक गणित को हल करना सीखेंगे । गणित में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली ये प्रश्नावली को हम बेसिक से पढ़ेंगे

      कक्षा 6 की प्रश्नावली 1 के 1.1 भाग में अंकों और हिंदी में लिखना सीखेंगे
      कक्षा 6 की प्रश्नावली 1 के 1.2 भाग में जोड़ना , घटाना , गुणा करना , और भाग सीखेंगे
      कक्षा 6 की प्रश्नावली 1 के 1.3 भाग में संख्या को व्यापक रूप में लिखना और जोड़ना , घटाना सीखेंगे

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      2. विमीय विक्ष्लेष्णDownload Click here
      3. ऋजु रेखीय पथ पे गतिDownload Click here
      4. सदिश विक्ष्लेष्णDownload Click here
      5. प्रक्षेप गतिDownload Click here
      6. बलDownload Click here
      7. घर्षणDownload Click here
      8. द्रव्यमानDownload Click here
      9. प्रष्ठ तनावDownload Click here
      10. उष्मीय प्रसार कैलोरिमितिDownload Click here
      11. ऊष्मा का स्थांतरणDownload Click here
      12. ऊष्मा इंजनDownload Click here
      13. ऊष्मा गतिकीDownload Click here
      14. सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियातंकाDownload Click here
      15. कक्षीय वेग तथा पालन वेगDownload Click here
      16. कार्य उर्जा सकतीDownload Click here











      विद्युत आवेश तथा क्षेत्र के नोट्स

      जब हम दो वस्तुओं (जैसे कांच की छड़ और रेशम) को आपस में रगड़ते हैं तो दोनों वस्तुएं आवेशित हो जाती हैं। परंतु इन दोनों वस्तुओं पर आवेश एक दूसरे से वितरित प्रकृति का होता है। एक वस्तु धनावेशित तथा दूसरी वस्तु ऋणावेशित हो जाती है। जैसा कि कांच की छड़ से इलेक्ट्रॉन निकलकर रेशम के टुकड़े में चले गए हैं इसलिए कांच की छड़ पर धनावेश तथा रेशम पर ऋणावेश आ जाता है क्योंकि ऋणावेशित परमाणु इलेक्ट्रॉन कांच की छड़ से निकल जाता है। यह हम जानते ही हैं कि इलेक्ट्रॉन पर ऋणात्मक आवेश होता है। इसी कारण कांच की छड़ पर धनात्मक आवेश आ जाता है।

      Note- परमाणु में भाग लेने वाले इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन ही होते हैं। किंतु परमाणु के नाभिक में प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन ही रहते हैं। जबकि इलेक्ट्रॉन परमाणु की बाहरी कक्षा में घूमता रहता है। इलेक्ट्रॉन पर ऋणात्मक आवेश होता है तथा प्रोटोन पर धनात्मक आवेश होता है एवं न्यूट्रॉन पर कोई आवेश नहीं होता यह उदासीन होता है।

      इलेक्ट्रॉन का आवेश = -e
      प्रोटोन का आवेश = +e
      α-कण का आवेश = +2e

      आवेश को दो भागों में बांटा गया है।
      (1) सजातीय आवेश (2) विजातीय आवेश

      (1) सजातीय आवेश :-

      इस प्रकार की आवेश एक दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं क्योंकि यह एक जैसी प्रकृति के आवेश होते हैं। जैसे (++ आवेश) या (– आवेश) ।

      (2) विजातीय आवेश :-

      इस प्रकार की आवेश एक दूसरे को आकर्षित करते हैं क्योंकि यह विपरीत प्रकृति के आवेश होते हैं। जैसे (+- आवेश) या (-+ आवेश) ।

      मूल आवेश :-

      मूल आवेश वह न्यूनतम आवेश है। जो किसी कण या वस्तु पर हो सकता है इसका मान 1.6×10-19 कूलाम होता है। जो की इलेक्ट्रॉन के आवेश के बराबर होता है। इसे ही मूल आवेश कहते हैं।

      आवेश का क्वांटीकरण :-

      किसी वस्तु पर आवेश की मात्रा e (इलेक्ट्रॉन) के पूर्व गुणज 1e, 2e या 3e हो सकती है 1.5e, 2.5e या 0.5e नहीं हो सकती है। इसे ही आवेश का क्वांटीकरण कहते हैं। आवेश के क्वांटीकरण में आवेश की मात्रा पूर्व होनी चाहिए।

      आवेश का सूत्र :-

      आवेश को (q) से प्रदर्शित किया जाता है।
      आवेश = चक्करों की संख्या × इलेक्ट्रॉन का आवेश
      q = ne
      आवेश का मात्रक ‘कूलाम’ होता है।

      विद्युत क्षेत्र में आवेश का सूत्र :-

      आवेश = धारा × समय
      q = it


      विद्युत क्षेत्र :-

      जब कांच की छड़ और रेशम को आपस में रगड़ते हैं। तो दोनों आवेशित हो जाते हैं। वह कारण जिससे कांच की छड़ और रेशम आवेशित होती हैं इसे ही विद्युत कहते हैं।

      विद्युत क्षेत्र की तीव्रता :-

      विद्युत क्षेत्र में किसी बिंदु पर रखें परीक्षण आवेश पर लगने वाले बल तथा परीक्षण आवेश के अनुपात उस बिंदु पर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता कहते हैं। विद्युत क्षेत्र की तीव्रता को E से प्रदर्शित करते हैं। एवं यह एक सदिश राशि है इसकी दिशा वही होती है जो धनावेश पर कार्यरत बल की दिशा होती है।

      विद्युत क्षेत्र की तीव्रता का सूत्र

      विद्युत क्षेत्र की तीव्रता = \large \frac{बल}{परीक्षण आवेश(q_o)}
      \footnotesize \boxed{E =\frac{F}{q_o}}
      विद्युत क्षेत्र की तीव्रता का मात्रक न्यूटन/कूलाम होता है एवं विमा [MLT-3A-1] होती है।

      Note- परीक्षण आवेश(qo) – वह आवेश जो परीक्षण में प्रयोग होता है उसे परीक्षण आवेश कहते हैं इसे qo से प्रदर्शित करते हैं यह हमेशा धनात्मक आवेश होता है।


      बिंदु आवेश के कारण विद्युत क्षेत्र की तीव्रता :-

      माना एक बिंदु आवेश +q बिंदु o पर स्थित है। इससे r दूरी पर एक बिंदु P है जिस पर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात करनी है। इसके लिए बिंदु P पर एक परीक्षण आवेश +qo रखते हैं। यदि इस पर लगने वाला बल F है। तो


      विद्युत बल रेखाएं :-

      विद्युत क्षेत्र में विद्युत बल रेखाएं वे काल्पनिक रेखाएं हैं। जिन पर एकांक धनावेश चलता है।

      इनके निम्न गुण हैं।
      (i) विद्युत बल रेखाएं धनावेश से प्रारंभ होकर ऋणावेश पर समाप्त हो जाती हैं।
      (ii) यदि आवेश एकल है तो विद्युत बल रेखाएं अनंत से प्रारंभ अथवा अनंत पर समाप्त हो सकती हैं।
      (iii) विद्युत बल रेखाएं कभी भी एक-दूसरे को नहीं काटती क्योंकि यदि काटती है तो कटान बिंदु पर बल की दो दिशाएं होंगी जो असंभव है।

      विद्युत द्विध्रुव :- इसको अलग पोस्ट में विस्तार पूर्वक तैयार किया गया है।

      विद्युत फ्लक्स :-

      विद्युत क्षेत्र में स्थित किसी पृष्ठ से गुजरने वाला विद्युत फ्लक्स उस पृष्ठ से गुजरने वाली विद्युत बल रेखाओं की संख्या की माप है। विद्युत फ्लक्स को ΦE से प्रदर्शित करते हैं।
      किसी विद्युत क्षेत्र E के कारण किसी सतह A से बद्ध विद्युत फ्लक्स
      ΦE = \overrightarrow{E}\overrightarrow{A}
      यदि विद्युत बल रेखाएं θ कोण बनाती हैं। तो विद्युत फ्लक्स
      ΦE = EA cosθ

      विद्युत फ्लक्स का मान विद्युत क्षेत्र तथा क्षेत्रफल के अदिश गुणनफल के बराबर होता है। यह एक अदिश राशि है इसका मात्रक न्यूटन-मीटर2/कूलाम या वोल्ट-मीटर होता है। तथा विमीय सूत्र [ML3T-3A-1] होता है।

      Note- यदि किसी बंद पृष्ठ से कुल विद्युत फ्लक्स भीतर प्रविष्ट हो रहा है तो विद्युत फ्लक्स ऋणात्मक होता है। अथवा यदि कुल विद्युत फ्लक्स सतह से बाहर जा रहा है। तो विद्युत फ्लक्स धनात्मक होगा।

      गौस की प्रमेय :- चैप्टर वन में से गौस की प्रमेय के अनुप्रयोग से एक प्रशन जरूर आता है।