अमर सिंह प्रथम ( 1597 - 1620 )
- मुगल मेवाड़ संधि - 5 फरवरी 1615 ई.
- यह संधि मुगल बादशाह जहांगीर और मेवाड़ के शासक अमर सिंह प्रथम के मध्य संपन्न हुई ।
- मेवाड़ की तरफ से संधि का प्रस्ताव लेकर हरिदास तथा शुभकरण गए थे ।
- मुगलों ने अपनी तरफ से खुर्रम शाहजहां ने संधि की थी ।
संधि की शर्ते
- मेवाड़ का राणा मुगल दरबार में नहीं जाएगा ।
- मेवाड़ का युवराज मुगल दरबार में जाएगा ।
- मेवाड़ मुगलों को 1000 घुड़सवार की सहायता देगा ।
- चित्तौड़ का किला मेवाड़ को वापस लिया जाएगा लेकिन मेवाड़ इसका पुनर्निर्माण नहीं करवा सकता ।
- वैवाहिक संबंध स्थापित नहीं किए जाएंगे
संधि का महत्व
- सांगा व प्रताप के समय से चली आ रही स्वतंत्रता की भावना का पतन हुआ ।
- युद्धों के बंद हो जाने से मेवाड़ में शांति व्यवस्था सुनिश्चित हुई जिससे कलात्मक गतिविधियों को बढ़ावा मिला ।
- युवराज करण सिंह जहांगीर के दरबार में गया था ।
- जहांगीर ने करण सिंह को 5000 का मनसबदार बनाया ।
- जहांगीर ने करण सिंह अमर सिंह के मूर्तियां आगरा के किले के बाहर लगाई थी
- अंग्रेजी राजदूत शासकों के अनुसार बादशाह ने मेवाड़ के राणा को आपस में समझौते से अधीन किया न कि बल से । उसने उसको एक प्रकार की बख्शिशो से ही अधीन किया ना कि जीत कर । उसको अधीन करने से बादशाह की आय में कोई वृद्धि नहीं हुई बल्कि उल्टा बादशाह को बहुत कुछ देना पड़ता था ।
( विलियम फॉस्टर द्वारा संपादित पुस्तक दी एम्बेसी ऑफ सर टॉमस रो से )
- अमरसिंह इस संधि से निराश था वह नौ चौकी राजस्थान राजसमंद चला गया था ।
- कालांतर में यहां पर राजसमंद झील का निर्माण करवाया था ।
ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में 1630 ईसवी का शाहजहानी मस्जिद के अभिलेख से यह ज्ञात होता है कि शहजादा खुर्रम ने मेवाड़ के साथ संधि के बाद यह मस्जिद बनवाई थी ।
- आहड़ उदयपुर में अमर सिंह की छतरी बनी हुई है अमर सिंह के बाद के सभी महाराणा की छतरियां आहड़ में ही स्थित है यह स्थान महासतिया कहलाता है ।
